यह बात सौ प्रतिशत सही है कि 'देने से ही चलती है दुनिया' । दान के सम्बन्ध में स्वामी विवेकानन्द ने बहुत अच्छी बात कही है-

'इस बात को आप कभी न भूलें कि आपका जन्म देने के लिये है, लेने के लिए नहीं । इसलिए आपको जो कुछ भी देना हो, वह बिना आपत्ति किये, बदले की इच्छा न रखकर दे दीजिए, नहीं तो दु:ख भोगने पड़ेगें । प्रकृति के नियम इतने कठोर हैं कि आप प्रसन्नता से न देंगे तो वह आपसे जबरदस्ती छीन लेगी । आप अपने सर्वस्व को चाहे जितने दिनों तक छाती से लगाए रहें, एक दिन प्रकृति आपकी छाती पर सवार हो उसे लिये बिना न छोड़ेगी । इससे तो राजी-खुशी देना ही अच्छा है । प्रकृति बेईमान नहीं है । आपके दान का बदला वह अवश्य चुका देगी ।'

दान से ही होता है प्रकृति में सन्तुलन

सम्पूर्ण सृष्टि का सन्तुलन दान पर ही आधारित है । सूरज समुद्र से जल ग्रहण करता है और पुन: वर्षा के रूप में लौटा कर संसार को तृप्त कर देता है । समुद्र ने कहा-परिग्रह (संग्रह) पाप है, उन्होंने अपना जल बादलों को दिया, बादलों ने सारा जल धरती पर बरसा दिया और वही जल नदियों के रास्ते समुद्र तक पहुंचा । समुद्र में पहले जितना जल था, देने पर वह एक बूंद भी कम नहीं हुआ ।

हिमालय से गंगा निकली तो पर्वत-खण्डों ने उसे रोका पर प्यास से व्याकुल लोगों, जीवों और खेतों को तृप्त करने और धरती को सींचने के लिए वह अपना जल लुटाती रही । हिमालय भी गंगा के परोपकार को देखकर और जल उड़ेलने लगा । गंगोत्री में गंगा जितनी थी वह सागर तक पहुंचते-पहुंचते कई गुना बड़ी हो गयी ।

चिड़ी चोंच भर ले गई नदी घट्यो नहिं नीर ।
दान दिये धन ना घटे कह गये दास कबीर ।।

धरती पर हम जो भी अन्न बीज रूप में बोते हैं, धरतीमाता उसमें अनन्तगुना वृद्धि कर हमारा पोषण करती है ।

वृक्षों जैसा दानी तो कोई है ही नहीं । वह तो अपने शरीर के हर अंग से जगत की सेवा करते हैं । धरती बोली वृक्षों मैं तुम्हें खाद देती हूँ, पानी देती हूँ, उससे तुम खुद को तृप्त करो, किसी को दो मत; लेकिन वृक्षों ने कहा-'मां ! हमें देने दो ।' वृक्षों ने फल, फूल, पत्ते यहां तक कि सूखने पर लकड़ियां तक दीं । पेड़-पौधे विषाक्त कार्बन-डाइऑक्साइड को लेकर हमें प्राणवायु ऑक्सीजन प्रदान करते हैं ।

कुएं से हम जल निकालते हैं, इससे कुआं सूखता नहीं । यदि कुएं का जल न निकालें तो एक समय बाद वह दूषित होकर पीने योग्य नहीं रहता है । निकालते रहने से कुएं का जल स्वत: शुद्ध हो जाता है ।

दान जगत् का प्राकृत धर्म है, मनुज व्यर्थ डरता है,
एक रोज तो हमें स्वयं, सब कुछ देना पड़ता है ।
बचते वही समय पर, जो सर्वस्व दान करते हैं,
ऋतु का ज्ञान नहीं जिनको, वे देकर भी मरते हैं ।। (रामधारीसिंह 'दिनकरजी')

विश्वास रखो, आज दोगे तो कल कई गुना होकर मिलेगा

दान वास्तव में प्राप्ति का ही दूसरा नाम है । सामर्थ्य के अनुसार दान करने से व्यक्ति दरिद्र नहीं होता है । समय की प्रतीक्षा न करें, विश्वास रखें 'आज दोगे तो कल कई गुना होकर मिलेगा ।'

जरथुस्त्र ने बहुत सुन्दर कहा है-'हमें तालाब के जल की तरह नहीं वरन् बहती नदी बनना चाहिए । ऐसे मनुष्य को ईश्वर अधिकाधिक देता है । दूसरों को देने से हमारी शक्ति, धन, ज्ञान, बल और धर्म कभी घटते नहीं, उल्टे बढ़ते ही हैं ।

स्वामी रामतीर्थ का कथन है-'निसर्ग का अर्थ है जो निरन्तर दान करता है । आज का दिया हुआ कल हजार गुना होकर लौटता है । त्याग और उत्सर्ग ही जीवन को सम्पन्न बनाता है ।'

विभिन्न वस्तुओं के दान से किन फलों की प्राप्ति होती है ?

सत्पात्र को दिया दान इस लोक में भोग और परलोक में मोक्ष देने वाला होता है । जिसे परलोक में अक्षय सुख की कामना हो वह अपने लिए संसार में या घर में सबसे प्रिय हो, उस वस्तु का दान ब्राह्मणों को करे । दान स्वर्ग, आयु व ऐश्वर्य प्राप्ति के लिए व अपने पापों की शान्ति के लिए किया जाता है ।

वैशाख मास में घी, अन्न व जल का दान करने का विशेष महत्व है । ऐसा करने से सभी प्रकार के भयों से मुक्ति हो जाती है ।
जल दान से मनुष्य को तृप्ति मिलती है,
अन्न दान से अक्षय सुख,
तिल दान से मनचाही संतान,
दीप दान से सुन्दर नेत्र,
भूमि दान से सभी मनवांछित पदार्थ,
गृह के दान से सुन्दर घर,
सुवर्ण दान से दीर्घ आयु,
चांदी दान से सुन्दर रूप,
वस्त्र दान करने से चन्द्रलोक,
अश्व दान करने से अश्विनीकुमारों का लोक,
बृषभ का दान देने से अथाह सम्पत्ति,
गो दान से सूर्यलोक,
शय्या दान करने से उत्तम पत्नी,
भयभीत प्राणी को अभय प्रदान करने से ऐश्वर्य की प्राप्ति,
धान्य दान करने से शाश्वत सुख,
वेदों को पढ़ाने से भगवान का सांनिध्य,
गाय को घास व चारा देने से पापों से मुक्ति,
ईंधन के लिए लकड़ी दान करने से मनुष्य अग्नि के समान तेजस्वी हो जाता है,
रोगियों को दवाई व भोजन दान देने से मनुष्य रोगरहित, सुखी व दीर्घायु होता है ।
सामर्थ्यवान मनुष्य आज समाज के कल्याण के लिए अपनी क्षमताएं और सम्पदाएं दे देता है तो कल वही क्षमता और योग्यता हजारगुना वैभव व विभूतियां होकर उसके पास लौटती हैं । कलियुग में दान ही एक ऐसा कार्य है जिसके करने से सभी संकट, कष्ट, विपत्ति व समस्याओं का समाधान हो जाता है । भारतीय संस्कृति में माना जाता है कि दान से देवता भी वश में हो जाते हैं। दान ईश्वर को प्रसन्नता प्रदान करता है-

और सब लोग भगवान की खोज करते,
किंतु दानी की खोज भगवान स्वयं करते हैं ।।