चार पैसे कमाने मैं आया था शहर------
गांव मेरा मुझे याद आता -------
अभय शर्मा
शुक्रवार की  अलसुबह महाराष्ट्र से मप्र आ रहे मजदूरों की ट्रेन दुर्घटना सामने आने के बाद हर कोई स्तब्ध है। जो फ़ोटो दिखे हृदय विदारक हैं। शायद उन्हें तो आशा थी लोहे की पटरियों के बीचोबीच चल सिर पर  बोझ उठाये कुछ समय बाद भुसावल स्टेशन से ट्रेन में सवार होकर अपने गांव पहुंच जाएंगे जिसे वे दो वक्त की रोजी रोटी के लिए छोड़ आये थे। उन्हें क्या पता थी नींद में इतने गहरे सो जाएंगे कि फिर जागेंगे ही नहीं।
लॉक डाउन के बाद से हर कोई अपने घर बापिस पहुंचने को बेताब है। लॉक डाउन में देखा कि जिसे जहां से रास्ता दिखाई दिया पकड़ कर चल दिया। ना किलोमीटर का नाप और ना ही यह सोचा कि इतना लंबा फैंसला कैसे तय होगा। 
यह किसी एक मजदूर की कहानी नहीं बल्कि सच्ची दास्तां है। 
कमोवश यही इनका हाल था। शायद उनका सबसे बड़ा दोष यह था कि वे मजदूर थे? 

घटना के बाद सिस्टम पर सवाल खड़े हो रहे हैं। होना भी लाजमी है क्योंकि दूसरे प्रदेश में बेचारे कहाँ जाते। दो वक्त की रोटी की जुगाड़ कहाँ से करते। वहां इनको खिलाता भी कौन? 
मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने  घटना सामने आने के बाद गहरा शोक जताया और तुरंत ही मृतकों  के परिजनों को 5-5 लाख और शव ट्रैन से पहुंचाने की व्यवस्था की। आदिम जाति कल्याण विभाग मंत्री को महाराष्ट्र के लिए अधिकारियों के साथ पहुंचाया। 
इस घटना के बाद सवाल यह है कि प्रदेश वार जिम्मेदारी सीएम ने अधिकारियों को दी थी। क्या उन्होंने अपने कर्तव्य का निर्वहन जिम्मेदारी पूर्वक किया। उन्होंने वहां की सरकार और जिला प्रशासन से समन्वय बनाकर सूची तैयार कराई कि प्रदेश के वहां पर कितने मजदूर हैं और वे किस हाल में हैं। विरोध का प्रमुख कारण इस बात को लेकर रहा कि जिम्मेदार ही लापरवाही वरत रहे हैं। जो नम्बर लिस्ट में था उस पर कोई सकारात्मक जवाब तो दूर संपर्क नहीं हो सका। 
दूसरी बात यह कि उमरिया और शहडोल जिले के मजदूर थे। क्या जिलों से संपर्क कर जानकारी एकत्रित नहीं की जा सकती थी। सिस्टम अगर चाह ले तो कुछ भी असंभव नहीं। लेकिन कहीं ना कहीं कमी रही। यहां बता दें कि महाराष्ट्र की जिम्मेदारी प्रमुख सचिव आदिम जाति कल्याण दीपाली रस्तोगी पर है। 
प्रदेश आगमन पर मजदूरों का होगा स्वागत---मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान शपथ ग्रहण के बाद कोरोना को लेकर हर रोज अधिकारियों के साथ बैठक कर रहे हैं। हाल ही में समस्त कलेक्टर्स को निर्देश भी दिए गए हैं कि प्रदेश आगमन पर उनके क्षेत्र में आने वाले मजदूरों का स्वागत करने के साथ आवश्यक व्यवस्थाएं की जाएं। सीएम ने अन्य प्रदेशों में फशे मजदूरों से अपील की है कि वे चिंता नहीं करें। पैदल चलने की जरुरत नहीं। सरकार खुद लेने आएगी।
36 घंटे से अधिक का समय पर कार्यवाही नहीं----
आरटीआई एक्टिविस्ट अजय दुबे ने घटना को लेकर कार्यवाही की मांग की है। सवाल उठाते हुए पूछा है कि क्या सरकार ने बड़े अधिकारियों की फ़ौज मृत मजदूरों को लाने के लिए तैनात की है। महाराष्ट्र के लिये तैनात जिम्मेदार अधिकारी से सबसे पहले पूछताछ हो। कोरोना जैसे जानलेवा संकट में हमारे ना हुए तो कब होंगे? अजय दुबे का कहना है कि 36 घंटे से अधिक का समय हो गया है। प्रमुख सचिव पर कार्यवाही नहीं हुई है। हालांकि शनिवार देर रात जारी स्थानन्तरित सूची में दीपाली रस्तोगी को आदिम जाति से हटाकर प्रमुख सचिव सूक्ष्म लघु एवं मध्यम उद्यम तथा उद्योग की जिम्मेदारी सौंपी गई थी।वहीं कांग्रेस भी हादसे को लेकर आक्रमक हो गयी है। मध्यप्रदेश कांग्रेस कमेटी के प्रदेश प्रवक्ता और भिंड दतिया संसदीय क्षेत्र से लोकसभा प्रत्याशी रहे देवाशीष जरारिया ने मांग की है कि मृतकों के परिजनों को सरकार 50-50 लाख की सहायता राशि दे। उनका कहना है कि सरकार को दोषी अधिकारी के विरूद्ध कार्यवाही करनी चाहिए। 

लिखते लिखते शब्द कम पड़ जाएंगे अंत मे इतना ही कि क्या उन मजदूरों को यह पता था कि जो रोटियाँ वे पोटली में रखे हैं यूं पटरियों पर उनके साथ विखर कर गिर जाएंगी। वो मजदूर थे यही मजबूरी थी जो मुसीबत बनी। चार पैसे कमाने मैं आया था शहर------
गांव मेरा मुझे याद आता -------