भव्य रथयात्रा और उसके पीछे की कहानी: 122 साल पुरानी परंपरा और जगन्नाथ मंदिर के रहस्यमयी तथ्य!
नगर को धर्म आयोजनों के चलते धर्मनगरी के नाम से जाना जाता है। क्योंकि यहां लगभग जितने भी धर्म आयोजन हैं जिसमें भाटापारा की रामलीला का आयोजन 106 वर्ष प्राचीन हो चुकी है। अखंड रामनाम सप्ताह का आयोजन लगभग 90 वर्ष से चला आ रहा है। उसी कड़ी में इससे भी प्राचीनतम एक आयोजन जो है वह है भगवान जगन्नाथ जी की रथ यात्रा लगभग पिछले 122 वर्षों से अनवरत निकली जा रही है।
भाटापारा के राम सप्ताह चौक के पास में स्थित जगन्नाथ मंदिर जहां भगवान जगन्नाथ के साथ बलभद्र महाराज और सुभद्रा देवी की मूर्ति स्थापित मंदिर है, जिस मंदिर को लटूरिया मंदिर के नाम से भी जाना जाता है जहां प्रतिवर्ष के आषाढ़ मास के द्वितीया के दिन रथ यात्रा का आयोजन किया जाता है इसमें भाटापारा के निवासियों के साथ आसपास के ग्रामीण क्षेत्र के सैकड़ो लोग भी रथ यात्रा में शामिल होते हैं और बड़ी ही धूमधाम से रथ यात्रा लटूरिया मंदिर से निकलकर भाटापारा के प्रमुख चौक चौराहो से होते हुए 10 से 15 किलोमीटर की यात्रा करते हुए वापस लटूरिया मंदिर में भगवान की स्थापना होती है। कहा जाता है इस दिन रथ यात्रा के माध्यम से भगवान जगन्नाथ सभी भक्तों के घर में पहुंचकर दर्शन देते हैं। जिसका आयोजन इस वर्ष 27 जून 2025 दिन शुक्रवार को होगा। जहां दोपहर 12 बजे भगवान की महाआरती और गजामूंग व महाप्रसाद का भोग लगाने के पश्चात दोपहर 1 से रथ यात्रा निकाली जाएगी ।
भाटापारा के लटूरिया मंदिर जो की जगन्नाथ भगवान का एक मात्र मंदिर है। वहां के वर्तमान पुजारी जगदीश वैष्णव हैं जो की चौथी पीढ़ी के हैं। बताया जाता है की प्राचीनतम समय 122 वर्ष से भी पहले लटूरिया महाराज के द्वारा इस मंदिर की स्थापना की गई थी। इस मंदिर में जो भगवान जगन्नाथ जी बलभद्र जी एवं सुभद्रा देवी की जो मूर्ति है।
वह चंदन काठ की लकड़ी से निर्माणित मूर्ति है, जिसे लटूरिया दास जी महाराज ने भाटापारा से लगभग 610 किलोमीटर की दूरी पर स्थित उड़ीसा राज्य के ‘पूरी’जहां भगवान जगन्नाथ का मंदिर है जो चारों धाम में से एक धाम है, वहां से लाया गया है लटूरिया दास जी महाराज जी के द्वारा भाटापारा से पैदल उड़ीसा राज्य के ष्पूरीष् पहुंचे और वहां से अपने मित्र मंडली के साथ भगवान जगन्नाथजी, सुभद्रा देवी एवं बलभद्र जी महाराज की मूर्ति को लेकर वापस पैदल भाटापारा आए और इस मंदिर की स्थापना की।
लटूरिया महाराज जी के बाद इस मंदिर का कार्यभार भगवान दास जी महाराज के हाथों में सौंपा गया। प्राचीनतम समय में बहुत वर्षों तक जो रथ यात्रा निकाली जाती थी वह लकड़ी की रथ थी जिसमें रथ यात्रा का आयोजन किया जाता था। वर्तमान में लोहे से बनी रथ में इस परंपरा का निर्वहन किया जा रहा है। कहते हैं ‘जगन्नाथ के भात को, जगत पसारे हाथ को’ जिस तरह से ‘पुरी’ के जगन्नाथ मंदिर में प्रसाद कभी कम नहीं पड़ता वैसे ही भाटापारा के लटूरिया महाराज के जगन्नाथ मंदिर का भंडारा रसोई भोजन कभी श्रद्धालुओं के लिए कम नहीं पड़ता। भगवान दास जी महाराज के बाद उनके नाती पोते के रूप में धन्ना महाराज इस मंदिर के पुजारी रहे और वर्तमान में धन्ना महाराज के पुत्र जगदीश वैष्णव के द्वारा इस मंदिर में पुजारी की भूमिका निभाई जा रही है।

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