बिना सिगरेट पिए भी बच्चों को हो सकता है लंग कैंसर? डॉक्टरों ने बताए चौंकाने वाले कारण
फेफड़ों का कैंसर (लंग्स कैंसर) आज के समय में वैश्विक स्वास्थ्य के लिए एक अत्यंत गंभीर खतरा बना हुआ है, और यह दुनिया भर में कैंसर से होने वाली मौतों का सबसे बड़ा कारण भी है। आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, हर साल लगभग 25 लाख नए मामलों में इस खतरनाक बीमारी का पता चलता है, और इसकी वजह से करीब 18 लाख लोगों की जान चली जाती है।
लंबे समय तक फेफड़ों के इस कैंसर को केवल धूम्रपान (स्मोकिंग) करने वालों की बीमारी माना जाता रहा है, लेकिन अब यह उन लोगों को भी अपनी चपेट में ले रहा है जिन्होंने अपने जीवन में कभी सिगरेट को हाथ तक नहीं लगाया है। इसके पीछे बढ़ता हुआ पर्यावरण प्रदूषण, हानिकारक रसायन और 'सेकेंड हैंड स्मोकिंग' मुख्य रूप से जिम्मेदार माने जा रहे हैं। चिंता की बात यह है कि अब बच्चे भी प्रदूषित हवा, जहरीले रसायनों और सेकेंड हैंड स्मोकिंग के सीधे संपर्क में आ रहे हैं। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि क्या कम उम्र के बच्चों में भी लंग्स कैंसर हो सकता है?
कम उम्र के लोगों और बच्चों में बढ़ते खतरे के आंकड़े
दुनियाभर में फेफड़ों के कैंसर को लेकर जन-जागरूकता बढ़ाने, इस बीमारी का शुरुआती चरण में ही पता लगाने और इससे प्रभावित लोगों की मदद करने के लिए हर साल 1 अगस्त को 'वर्ल्ड लंग कैंसर डे' (विश्व फेफड़ों का कैंसर दिवस) मनाया जाता है।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि कैंसर का यह खतरा अब कम उम्र के लोगों में भी लगातार बढ़ता हुआ देखा जा रहा है। यहाँ तक कि बच्चे भी इसका शिकार हो सकते हैं, हालांकि बच्चों में लंग्स कैंसर को लेकर स्थिति वयस्कों से काफी अलग होती है। बच्चों में फेफड़ों का प्राथमिक कैंसर बहुत ही कम देखने को मिलता है। चिकित्सीय आंकड़ों के अनुसार, बच्चों में होने वाले सभी प्रकार के कैंसर मामलों में लंग्स कैंसर की हिस्सेदारी 0.2 प्रतिशत से भी कम है, इसलिए इसे बेहद दुर्लभ माना जाता है।
वयस्कों के विपरीत, बच्चों में फेफड़ों के ट्यूमर का संबंध शायद ही कभी प्रत्यक्ष धूम्रपान या पर्यावरणीय प्रदूषकों से होता है। बच्चों में इसके मुख्य कारण ज्यादातर जेनेटिक (आनुवंशिक) कारक, जीन में म्यूटेशन (उत्परिवर्तन) या रेडॉन गैस जैसे कुछ दुर्लभ पर्यावरणीय कारण हो सकते हैं। यानी जीवनशैली से जुड़ी धूम्रपान जैसी आदतें बच्चों में इस बीमारी का कारण नहीं बनती हैं।
सेकेंड हैंड स्मोकिंग बच्चों के लिए बन सकता है बड़ा खतरा
यदि आप स्वयं धूम्रपान नहीं करते हैं, लेकिन घर, दफ्तर या किसी भी सार्वजनिक स्थान पर लगातार तंबाकू के धुएं के संपर्क में रहते हैं, तो इसे 'सेकेंड हैंड स्मोक' कहा जाता है।
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बच्चों में भी यह जहरीला धुआं फेफड़ों की गंभीर बीमारियों और खतरनाक किस्म के कैंसर को बढ़ावा देने वाला साबित हो सकता है।
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बच्चों, गर्भवती महिलाओं और बुजुर्गों पर इसका शारीरिक प्रभाव सबसे अधिक और घातक हो सकता है।
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ऐसे दूषित और तंबाकू के धुएं वाले वातावरण में रहने वाले बच्चों को भविष्य में फेफड़ों की गंभीर और लाइलाज समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है।
घोर वायु प्रदूषण भी है एक बहुत बड़ा जोखिम कारक
आज के समय में लगातार बढ़ता हुआ वायु प्रदूषण भी फेफड़ों के कैंसर के प्रमुख और सबसे बड़े जोखिम कारकों में से एक बनता जा रहा है।
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हवा में मौजूद पीएम 2.5 (PM 2.5) जैसे बेहद सूक्ष्म और जहरीले कण सांस के जरिए फेफड़ों की गहराई तक पहुँच जाते हैं और वहां की स्वस्थ कोशिकाओं को गंभीर नुकसान पहुँचाते हैं।
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लंबे समय तक अत्यधिक प्रदूषित हवा में जीवन बिताने वाले लोगों में कैंसर सहित श्वसन तंत्र (Respiratory system) से जुड़े कई अन्य गंभीर रोगों का खतरा कई गुना बढ़ जाता है।
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चूंकि बच्चों के फेफड़े अभी विकसित हो रहे होते हैं, इसलिए प्रदूषित हवा का नकारात्मक प्रभाव उन पर वयस्कों की तुलना में बहुत अधिक और जल्दी पड़ता है।
आनुवंशिक कारण और फैमिली हिस्ट्री का जोखिम
कुछ लोगों में फेफड़ों के कैंसर का खतरा आनुवंशिक कारणों या माता-पिता से मिलने वाले जीन में बदलाव के कारण भी अधिक हो सकता है। हालांकि, इसका मतलब यह कतई नहीं है कि बीमारी निश्चित रूप से होगी ही, लेकिन ऐसे लोगों को अपनी नियमित स्वास्थ्य जांच (Health Checkup) कराते रहना चाहिए। यदि परिवार के इतिहास में पहले कभी किसी को कम उम्र में फेफड़ों का कैंसर हुआ हो, तो ऐसे परिवारों के सदस्यों को विशेष रूप से सतर्कता बरतने की आवश्यकता होती है।

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