4.75 करोड़ में खत्म हुई चहल-धनश्री की शादी, दिल्ली हाई कोर्ट ने तलाक पर की अहम टिप्पणी
हाल ही में क्रिकेटर युजवेंद्र चहल और उनकी कोरियोग्राफर पत्नी धनश्री ने अपने-अपने रास्ते अलग कर लिए हैं. शादी के करीब 4 साल और 3 महीने बाद दोनों के बीच तलाक हो गया है. इस तलाक के बदले एलिमनी के तौर पर चहल की ओर से धनश्री को 4.75 करोड़ रुपये देने पर भी सहमति बनी है, जिसका 50 फीसदी हिस्सा भारतीय क्रिकेटर ने दे दिया है और बाकी हिस्सा अब धनश्री को मिलेगा.
जहां इधर एक तरफ धनश्री और चहल की शादी 4.75 करोड़ में खत्म हुई है. वहीं, उधर दूसरी तरफ दिल्ली हाई कोर्ट ने तलाक के बाद पति की तरफ से पत्नी को मिलने वाली एलिमनी को लेकर बड़ी नसीहत दी है. दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि अगर कोई महिला पढ़ी-लिखी है और वो काम करने के लिए योग्य है तो सिर्फ एलिमनी हासिल करने के लिए जानबूझकर काम छोड़ कर नहीं रहना चाहिए.
कोर्ट ने दी एलिमनी को लेकर नसीहत
कोर्ट ने यह नसीहत एक ऐसे केस में दी जिसमें पति से लंबे समय से अलग रह रही पत्नी गुजारा भत्ता की मांग कर रही थी. कपल ने दिसंबर 2019 में शादी की और सिंगापुर चले गए थे. महिला ने कहा कि कथित तौर पर उसके पति और ससुराल वालों ने उसके साथ क्रूरता की जिसके चलते महिला साल 2021 में भारत लौट आई. जून 2021 में उसने पति से एलिमनी हासिल करने के लिए याचिका दायर की थी.
पति से अलग रह रही महिला ने ऑस्ट्रेलिया से इंटरनेशनल बिजनेस में मास्टर्स किया है और उन्होंने दुबई में काम किया है, लेकिन अब वो वर्किंग नहीं है और काम करना पसंद नहीं कर रही है. इसी के चलते अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि कानून जानबूझकर काम करने को छोड़ देने को बढ़ावा नहीं देता है. कोर्ट ने इस केस में महिला को राहत देने से इनकार कर दिया है.
“जानबूझकर काम नहीं छोड़ना चाहिए”
जस्टिस सीडी सिंह ने एक केस की सुनवाई करते हुए मंगलवार को कहा, इस केस में महिला इतनी पढ़ी लिखी और अनुभवी है कि वो जॉब हासिल कर के अच्छी जिंदगी जी सकती है, लेकिन सिर्फ पति से एलिमनी हासिल करने के लिए महिला को जानबूझकर काम नहीं छोड़ना चाहिए. कोर्ट ने आगे कहा, इसलिए इस मामले में अंतरिम मेंटेनेंस को हतोत्साहित (Discouraged) किया जा रहा है क्योंकि यह अदालत याचिकाकर्ता में कमाई करने और अपनी शिक्षा का लाभ उठाने की काबिलयत देख सकती है.
अदालत ने कहा कि जिन पत्नियों के पास कमाने की काबिलयत होती है, लेकिन फिर वो जानबूझकर काम नहीं करती हैं, उन्हें अंतरिम मेंटेनेंस के लिए दावा नहीं करना चाहिए. कोर्ट ने आगे कहा, सीआरपीसी की धारा 125 पति-पत्नी के बीच समानता बनाए रखने, पत्नियों, बच्चों और माता-पिता को सुरक्षा देने आलस्य को बढ़ावा नहीं देने का विधायी इरादा रखती है.
महिला की याचिका की खारिज
नौकरी में अनुभव के साथ एक अच्छी तरह से शिक्षित पत्नी को सिर्फ अपने पति से गुजारा भत्ता पाने के लिए जानबूझकर काम नहीं छोड़ना चाहिए. इसी के चलते कोर्ट ने पति से अंतरिम गुजारा भत्ता देने से इनकार करने वाले ट्रायल कोर्ट के आदेश के खिलाफ महिला की याचिका को खारिज कर दिया. कोर्ट ने समझाया कि अगर पत्नी को सच में एलिमनी की जरूरत है तो अदालतों को इस बात से संतुष्ट होने की जरूरत है कि एलिमनी मांगने की वजह क्या है.
साथ ही कोर्ट ने याचिकाकर्ता को आत्मनिर्भर बनने के लिए नौकरी की तलाश करने के लिए प्रोत्साहित किया, यह कहते हुए कि उसके पास व्यापक अनुभव है और वह सांसारिक मामलों के बारे में जानती थी. वहीं, कोर्ट ने कहा और महिलाओं की तरह जो शिक्षित नहीं है और वो बुनियादी जरूरतों के लिए पूरी तरह से अपने जीवनसाथी पर निर्भर हैं.
साथ ही कोर्ट ने कहा कि केस में महिला ने दावा किया कि वो नौकरी ढूंढने की कोशिश कर रही थी, लेकिन न तो उन्होंने अपने दावे के समर्थन में कोई सबूत पेश किया और न ही अपनी व्यावसायिक गतिविधियों को फिर से शुरू किया. अदालत ने महिला और उसकी मां के बीच व्हाट्सएप चैट पर भी रोशनी डाली, जहां मां बेटी को सलाह देती है कि अगर वो नौकरी हासिल कर लेती है तो उसका गुजारा भत्ता का दावा खतरे में पड़ जाएगा. अदालत ने कहा, गुजारा भत्ता की याचिका से पहले की यह बातचीत साफ दिखाती है कि महिला गुजारा भत्ता हासिल करने के लिए जानबूझकर बेरोजगार थी.

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