केरल में सतीशन सरकार का बड़ा फैसला, सिल्वरलाइन प्रोजेक्ट पर लगी रोक
तिरुवनंतपुरम। केरल में नवगठित सरकार के कार्यभार संभालते ही बड़े और जनहितैषी फैसलों का दौर शुरू हो गया है। मुख्यमंत्री वीडी सतीशन की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट की पहली बैठक के बाद राज्य के विकास और प्रशासनिक व्यवस्था को लेकर कई युगांतकारी घोषणाएं की गई हैं। नई सरकार ने राज्य के सबसे चर्चित और विवादित 'सिल्वरलाइन रेल प्रोजेक्ट' को पूरी तरह से ठंडे बस्ते में डालने यानी बंद करने का ऐतिहासिक निर्णय लिया है। इसके साथ ही सरकार ने इस परियोजना के लिए किए जा रहे भूमि अधिग्रहण की अधिसूचना को भी तत्काल प्रभाव से निरस्त कर दिया है।
आंदोलनकारियों को मिली बड़ी राहत और केस होंगे वापस
सरकार का यह फैसला उन हजारों स्थानीय लोगों, किसानों और पर्यावरणविदों के लिए एक बड़ी जीत के रूप में देखा जा रहा है जो पिछले लंबे समय से इस परियोजना के खिलाफ सड़कों पर आंदोलन कर रहे थे। मुख्यमंत्री सतीशन ने जनता को राहत देते हुए इस विरोध प्रदर्शन के दौरान प्रदर्शनकारियों और आम नागरिकों के खिलाफ दर्ज किए गए सभी पुलिस मुकदमों को वापस लेने की सिफारिश करने का भी निर्णय लिया है। सरकार के इस कदम से उन परिवारों ने राहत की सांस ली है जो कानूनी पचड़ों में फंसे हुए थे। इसके साथ ही, रोजगार की तलाश कर रहे युवाओं के लिए भी सरकार ने बड़ा तोहफा देते हुए पब्लिक सर्विस कमीशन (PSC) की रैंक लिस्ट की समय-सीमा को आगामी 30 नवंबर तक के लिए आगे बढ़ा दिया है।
क्या थी पूर्ववर्ती सरकार की महत्वाकांक्षी 'सिल्वरलाइन योजना'
सिल्वरलाइन प्रोजेक्ट दरअसल केरल की पूर्ववर्ती पिनराई विजयन सरकार की एक बेहद महत्वाकांक्षी सेमी-हाई-स्पीड रेल परियोजना थी, जिसे लगभग 64,000 करोड़ रुपये की भारी-भरकम अनुमानित लागत से तैयार किया जाना था। तत्कालीन सरकार का तर्क था कि यह रेल कॉरिडोर केरल के उत्तरी और दक्षिणी छोरों को आपस में जोड़ेगा, जिससे सफर का समय बेहद कम हो जाएगा और यह राज्य के आर्थिक विकास की धुरी बनेगा। हालांकि, इस ड्रीम प्रोजेक्ट की घोषणा के बाद से ही कांग्रेस, भाजपा समेत तमाम विपक्षी दल और पर्यावरण संरक्षण से जुड़ी संस्थाएं इसके खिलाफ लामबंद हो गई थीं।
विनाशकारी प्रभाव और विस्थापन बना विरोध की मुख्य वजह
इस खर्चीली परियोजना का चौतरफा विरोध होने के पीछे कई गंभीर सामाजिक और पर्यावरणीय कारण थे। विशेषज्ञों और आंदोलनकारियों का साफ तौर पर कहना था कि यह रेल मार्ग केरल के बेहद संवेदनशील आर्द्रभूमि (वेटलैंड्स), उपजाऊ धान के खेतों और प्राकृतिक पहाड़ियों के बीच से होकर गुजरना था, जिससे राज्य के पारिस्थितिक तंत्र को अपूरणीय क्षति पहुंचती। इसके अलावा, एक बड़ा मानवीय संकट यह भी था कि इस परियोजना को धरातल पर उतारने के लिए लगभग 20 हजार से अधिक परिवारों को अपनी पुश्तैनी जमीन और घरों से हाथ धोना पड़ता, जिससे बड़े पैमाने पर विस्थापन का खतरा मंडरा रहा था। इन्ही सब चिंताओं को देखते हुए नई सरकार ने इस पर हमेशा के लिए रोक लगा दी है।

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